जलगांव, 24 अगस्त, प्रतिनिधि: खानदेश की मिट्टी की खुशबू, मेहनतकश जीवन, प्रकृति और आम इंसान के जीवन-दर्शन को अपनी सहज बोलीभाषा की कविताओं में उतारने वाली लोककवयित्री बहिणाबाई चौधरी की 146वीं जयंती के अवसर पर जलगांव स्थित बहिणाबाई स्मृति संग्रहालय में ‘बहिणाईंचे भावविश्व’ कार्यक्रम उत्साहपूर्वक आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का आयोजन बहिणाबाई मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से किया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध लेखक, कवि और नाटककार किरण येले मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विठ्ठल मंदिर संस्थान के विलास हरी चौधरी ने की।

किरण येले ने बहिणाबाई के साहित्य को संत कबीर और संत तुकाराम की विचारधारा से जोड़ते हुए कहा कि बहिणाबाई केवल महिला कवयित्री नहीं थीं, बल्कि समाज को गहराई से पढ़ने वाली संवेदनशील साहित्यकार थीं। उन्होंने कहा कि जिस साहित्य के केंद्र में इंसान होता है, वही साहित्य चिरस्थायी बनता है।

बहिणाबाई की कविताओं में खेती, प्रकृति, श्रम, संसार, रिश्तों और सामान्य व्यक्ति के जीवन का गहरा दर्शन दिखाई देता है। किरण येले ने कहा कि रिश्तों को केवल जोड़ने और तोड़ने के व्यवहार के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनमें मौजूद संवेदनाओं और भावनात्मक संबंधों को बचाए रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सिर्फ होंठ और पेट भरना पर्याप्त नहीं, मन का भरना भी जरूरी है। प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते का उल्लेख करते हुए उन्होंने गुलमोहर के पेड़ के प्रतीकात्मक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार कबीर, तुकाराम और बहिणाबाई ने समाज को केवल देखा नहीं, बल्कि उसके भीतर के जीवन और भावनाओं को अनुभव किया और उसे अपने शब्दों में अभिव्यक्त किया।

कार्यक्रम की शुरुआत एम. जे. महाविद्यालय के मराठी विभाग के विद्यार्थियों द्वारा बहिणाबाई की सामूहिक कविता ‘माह्यी माय सरसोती’ की प्रस्तुति से हुई। रूपाली माली ने ‘माझी मुक्ताई’ और प्राची शेरे ने ‘अरे संसार संसार’ कविता प्रस्तुत की। इस दौरान विद्यार्थियों को शैक्षणिक सामग्री का वितरण भी किया गया।

कार्यक्रम में बहिणाबाई परिवार की सदस्य पद्माबाई चौधरी, स्मिता चौधरी सहित अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद और साहित्यप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रस्तावना भाषण गिरीष कुलकर्णी ने दिया, संचालन प्रा. गोपीचंद धनगर ने किया और आभार प्रदर्शन भी गिरीष कुलकर्णी ने किया।